जंगल गया किसके भरोसे- साखू की अवैध कटान का खेल?

गौरव त्रिपाठी
गौरव त्रिपाठी

उत्तर प्रदेश के बलरामपुर और गोंडा जनपद इन दिनों साखू (Sal) की बेशकीमती लकड़ी की अवैध कटान को लेकर चर्चा में हैं। आरोप है कि संरक्षित श्रेणी में आने वाली इस कीमती लकड़ी का बड़े पैमाने पर दोहन किया जा रहा है और वह भी स्थानीय स्तर पर संरक्षण के साथ।

सूत्रों की मानें तो सरकारी नियमों के तहत साखू जैसी संरक्षित प्रजाति का सामान्य परमिट जारी नहीं किया जाता। बावजूद इसके, क्षेत्र के कुवानों और वन सीमाओं में पेड़ों की ताबड़तोड़ कटाई देखी जा रही है। सवाल यह है कि अगर परमिट नहीं, तो फिर लकड़ी बाजार तक पहुंच कैसे रही है?

रात का खेल, दिन की चुप्पी

ग्रामीणों का दावा है कि रात के अंधेरे में ट्रैक्टर-ट्रॉली और छोटे वाहनों से लकड़ी की ढुलाई होती है। कई बार शिकायतें हुईं, लेकिन कार्रवाई अक्सर “औपचारिक” ही नजर आई।

हाल ही में वन विभाग की टीम ने नौ बोटा साखू जब्त किए, पर स्थानीय लोगों का कहना है “यह तो ऊंट के मुंह में जीरा” है। असली सवाल यह है कि क्या यह कार्रवाई नाकाफी थी या केवल दिखावे के लिए?

40 से 60 हजार का एक पेड़: क्यों है इतना लालच?

स्थानीय बाजार में साखू की लकड़ी 1400 से 1900 रुपये प्रति क्यूबिक फुट बिक रही है। अनुमान है कि एक परिपक्व पेड़ की कीमत 40 से 60 हजार रुपये तक पहुंच जाती है। ऐसे में यह धंधा तस्करों के लिए “Low Risk, High Profit” मॉडल बन चुका है।

जानकारों का मानना है कि अगर परमिट, चालान और परिवहन दस्तावेजों की गहन जांच हो, तो बड़े स्तर की अनियमितताएं सामने आ सकती हैं।

Environment vs. “Management”?

एक तरफ सरकार और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी संस्थाएं वन संपदा बचाने के अभियान चला रही हैं, दूसरी ओर जमीनी हकीकत अलग कहानी कह रही है।

पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि यह केवल अवैध कटान नहीं, बल्कि ecological imbalance की ओर बढ़ता कदम है। साखू जैसे वृक्ष जलवायु संतुलन, मिट्टी संरक्षण और जैव विविधता के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।

प्रशासन से क्या मांग?

स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यदि जिम्मेदार अधिकारियों और कथित संरक्षण देने वालों पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो जंगल की लूट यूं ही जारी रहेगी।

सवाल सीधा है जंगल बचेगा या सिर्फ फाइलों में हरियाली दिखेगी?

Balrampur और Gonda का यह मामला सिर्फ लकड़ी की कटान नहीं, बल्कि सिस्टम की जवाबदेही की परीक्षा बनता जा रहा है।

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